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कुम्भ विवाह का परिचय

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                                                       कुम्भ विवाह का परिचय

अर्क विवाह या कुम्भ विवाह एक विशेष प्रकार का विवाह है, जिसे विशेष रूप से हिंदू धर्म की विवाह संस्कार की श्रेणी में रखा जाता है। यह विवाह पारंपरिक और धार्मिक दृष्टिकोण से कुछ अलग होता है, और इसके पीछे धार्मिक और ज्योतिषीय कारण होते हैं।

इस विवाह का मुख्य उद्देश्य संचित ग्रह दोषों को दूर करना और व्यक्ति के जीवन में सुख, समृद्धि और सामंजस्य लाना है।

कुम्भ विवाह का महत्व:

  • ग्रह दोषों को शांत करना: राहु और केतु जैसे दोषों का निवारण।
  • अशुभ योग का निवारण: मंगल और अन्य ग्रह दोषों को शांत करना।
  • संतान सुख: संतान प्राप्ति में मदद।
  • जीवन की बाधाओं का निवारण: मानसिक और शारीरिक शांति।

कुम्भ विवाह की विधि:

  1. कुंडली का अध्ययन: दोषों की पहचान।
  2. पारंपरिक अनुष्ठान: हवन, पूजन और मंत्र जाप।
  3. कुम्भ कुंडल का प्रयोग: विशेष कलश का उपयोग।
  4. विवाह संस्कार: सप्तपदी और सिंदूर विधि।
  5. दान और तर्पण: पुण्य और ग्रह शांति के लिए।

कुम्भ विवाह के लाभ:

  • ग्रह दोषों का शमन
  • विवाह में सफलता
  • संतान सुख
  • मानसिक और शारीरिक शांति
  • धार्मिक उन्नति

कुम्भ विवाह कब करना चाहिए?

  1. मंगल दोष के कारण: विवाह में देरी के समाधान के लिए।
  2. संतान सुख के लिए: संतान प्राप्ति की बाधा दूर करने हेतु।
  3. कुंडली में राहु-केतु दोष: जीवन में समस्याओं के निवारण हेतु।

निष्कर्ष:

कुम्भ विवाह एक धार्मिक और ज्योतिषीय प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य ग्रह दोषों को शांत करना और जीवन में सुख, समृद्धि और मानसिक शांति प्राप्त करना है। यह विवाह उन व्यक्तियों के लिए महत्वपूर्ण है, जो मंगल दोष, केतु दोष, या अन्य ग्रह दोषों से प्रभावित हैं।